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जिस्मं

Written by Harshita ✍️✍️
#Jazzbaat
सर्द रातों ने दूर से आती रिश्तों की महक।
लाएं थे वो लालटेन जलाकर उसकी आंखों।
में बेख़ौफ़ ज़र्रा दिखाई देता रहा।
एक सुनसान सड़क पर अकेली सेहमी सी।
किसी की भावनाओं की तलाश कर रही थी।
इंसानियत नहीं हेवानिंयत दिखाते लालटेन की।
रोशनीं को मेरी और दिखाते हुए ।
मेंने नज़र दौड़ाई काशं कोई होता आसपास जो।
मेरी बेबसी का नंगा नाच ना देख पा रहा होता।
मेरे औरत होने पर लाचारी ।कपड़ों के चीथड़े उड़ा ना रहा होता।
किसी ने ना सुनी मेरी चीखें जो एक सांस में देती रही मैं।
जिस्मं नोच कर फैंक दिया।किसी लावारिसं की तरह।
क्या हासिंल हुआ विश्वास का घात कर के।
इंसानियत को सूली पर चढ़ा कर दरिंदो को ।
क्या मिला ।
कल अब मेरी लाशं बरामद हुए मेरे मां बाबा की चीखें।।
मेरी भटकती आत्मा देखती रही।
उनकी आवाजें निकलने ।
छाती पीटती मेरी मां ।
के सुलगते सवाल।
मेरे जिस्मं के निशानों को मरहम लगाती रही।
मैं वहीं बैंठ कर सब देखती रही। रोती रही।
मै ख़ुद अपने जिस्मं को पहचान नहीं पा रही थी।
मेरी मां बाबा मुझे पकड़ कर झनझोड़ते रहे।
सुलगती रही देहकते अंगारों अपने सीने में।
कुछ ऐसा हो जाएं।
यूं दरिंदो के मर्द होने पर जितना गुरूंर है।
वहीं शर्मिंदगी का सबब बन जाएं।
जैसे मेरे जिस्मं को नोचा है।
वैसे ही चील कौव्वों उनकी ।
लावारिसं लाशें को नोचती रहे।
उनको सारे आम मर्द होने की ।
निशानी कांट कटघरे में खड़ा कर।
सवालों की बारिशं कर दी जाएं।
और वो ख़ुद ही अपनी नज़रों में गिर।
ख़ुद ब ख़ुद फंसी पर चढ़ जाएं।
या मौंत की भीकं भी मांगे तो उनको ।
अधमरी हालात में लावारिसं लाशं को ।
यूं ही जंगली कुत्तों के आगे छोड़ दिया जाएं।


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