Written by Harshita ✍️✍️
#Jazzbaat
कुछ अरमान छलक गए
कुछ एहसास छलक गए
मेरे आंखों से वो अश्कों
के धार छलक गए।
जब याद आई बचपन की
गलियों के तारे चमक गए।
वो चादूं चाचा की दुकान से
एक रुपए की टॉफी से जहां
मिल जाना जैसे।
वो ठिठुरती सर्दी में ना नहाने
की ज़िद पकड़ लेना।फिर डांट
खा कर नहाना, मां ने नहाते ही
गर्मं म गरम शीरा देसी घी बादाम से
भरपूर पिलाना ताकि हमे ठंड ना लगना।
दोस्तों के बीच चौराहे पर खड़े इमली वाले
की राह ताकते रहना बड़ा याद आता है।
शर्तें भी कश्ती को पार के जाने की होती।
नेहर पर नहाने की होती।
तूफ़ान में घर ना जाने की होती।
मां के हाथों के गाजर का हलवा खाने की शर्तें होती।
साइकल पर दूर जाने की होती ,
तेज़ी से मोड़ लेने की होती,
कल पहले मिलने की होती,
जल्दी चॉकलेट खाने की होती,
मां को पिकनिक पर भेजने के लिए
पटाने की होती,
घर पर दोस्तो को बुलाने की होती।
झूले झूलने जाने की होती,
पार्कं में लटकने की होती,
महज़ होती थी वो छोटी छोटी शर्तें
कहानियां ब्यांन किसी को कैसे बताती,
बचपन के दिनों को संजोए दिल में
जज़्बात ज़िन्दगी में कभी नहीं ख़तम
होते, बस जिम्मेदारियों के बोझं तले
कही बचपन गुम हो जाता है,
वो नन्हे बच्चों हमारे अंदर हमेशा सफ़र करते है,
पर कहीं खो से जाते है,सो से जाते है,
बचपन को कही खोने मत दो,
जिंदा रहो सोने मत दो,
ख़ुद को खोने मत दो
बचपन की यारी को यादों
में ज़िंदा बस रहने मत दो,
जीयो खुल के खुशियों की
बारिश होने दो। ख़ुश रहो।
#Jazzbaat
कुछ अरमान छलक गए
कुछ एहसास छलक गए
मेरे आंखों से वो अश्कों
के धार छलक गए।
जब याद आई बचपन की
गलियों के तारे चमक गए।
वो चादूं चाचा की दुकान से
एक रुपए की टॉफी से जहां
मिल जाना जैसे।
वो ठिठुरती सर्दी में ना नहाने
की ज़िद पकड़ लेना।फिर डांट
खा कर नहाना, मां ने नहाते ही
गर्मं म गरम शीरा देसी घी बादाम से
भरपूर पिलाना ताकि हमे ठंड ना लगना।
दोस्तों के बीच चौराहे पर खड़े इमली वाले
की राह ताकते रहना बड़ा याद आता है।
शर्तें भी कश्ती को पार के जाने की होती।
नेहर पर नहाने की होती।
तूफ़ान में घर ना जाने की होती।
मां के हाथों के गाजर का हलवा खाने की शर्तें होती।
साइकल पर दूर जाने की होती ,
तेज़ी से मोड़ लेने की होती,
कल पहले मिलने की होती,
जल्दी चॉकलेट खाने की होती,
मां को पिकनिक पर भेजने के लिए
पटाने की होती,
घर पर दोस्तो को बुलाने की होती।
झूले झूलने जाने की होती,
पार्कं में लटकने की होती,
महज़ होती थी वो छोटी छोटी शर्तें
कहानियां ब्यांन किसी को कैसे बताती,
बचपन के दिनों को संजोए दिल में
जज़्बात ज़िन्दगी में कभी नहीं ख़तम
होते, बस जिम्मेदारियों के बोझं तले
कही बचपन गुम हो जाता है,
वो नन्हे बच्चों हमारे अंदर हमेशा सफ़र करते है,
पर कहीं खो से जाते है,सो से जाते है,
बचपन को कही खोने मत दो,
जिंदा रहो सोने मत दो,
ख़ुद को खोने मत दो
बचपन की यारी को यादों
में ज़िंदा बस रहने मत दो,
जीयो खुल के खुशियों की
बारिश होने दो। ख़ुश रहो।

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