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क्यों बदलूँ मैं खुद को



क्यों बदलूँ मैं खुद को
पैदा होते ही रिश्ते जुड़ने लगे थे
सूने आंगन में किलकारियां गुज़ने लगी
फिर भी मैं अलग सी ही होने लगी
क्यों बदलू खुद को।

स्कूल के बस्तों में किताबों के बोझ में
दबे ज़िम्मेदारी का एहसास भी होने लगा
कच्ची उम्र में रिश्ता पक्का होने लगा
क्यों बदलूँ मैं खुद को।

ये एहसास होने लगा
ये घर मेरा नहीं ये भी
बचपन से सुनने लगी थी
घर की दहलीज लगने
पर भी टोक लगने लगी
क्यों बदलूँ मैं खुद को।

ये बात बार बार दिल को चुभने लगी
प्यार लगाव मां बाबा के
संस्कारों की दुहाई देने लगी
अब दूसरे घर की दहलीज को
अपनी ख्वाहिशों को वहीं
चौखट पर टांग कर पार करने लगी
क्यों बदलूं मैं खुद को।

बस ये बात दिल में सैलाब उठाने लगी
दुनिया ने खुद ही बदल दिया बोल बोल कर
मर्यादा में रहना खुद ही को सिखाती रही
क्यों बदलूँ मैं खुद को।

अर्धांगिनी बन बनकर दूसरे को
अपनी इज़्ज़त को रोंद वाती रही
क्यों बदलूँ मैं खुद को।

दुनिया की परवाह से
खुद को रोज़ मारती रही
मां बनने के एहसास से
खुद को सहलाती रही

मार डलवाया उस अंश को
जो मेरी कोख में पनपने लगी थी
क्यों बदलूँ मैं खुद को।

ये बेगैरत लोगों ने खुद ही
बदलने पर मजबूर किया था
अब फिर मां बनने की खुशी ने
मुझसे फिर से झंझोड़ा था
क्यों बदलूँ मैं खुद को।

कोख से आवाज़ आने लगी थी
मां में तेरी बेटी हूं
तेरी परछाई बन कर साथ निभाउंगी,
अब ना रोंदने देना मेरे दिल को
तेरे दिल से यूं,
धड़क जायूगी तेरा साथ निभाउंगी
क्यों बदलूँ मैं खुद को।

अब खुद ही कुछ बदल गया था अंदर मेरे
अब आवाज़ उठाने का वक़्त आ गया था
दुनिया को दिखाना था,
मैं बेटी हूं तो क्या हुआ।

जननी बनकर खुद को और
अपनी बेटी को शेरनी की तरह पालूँगी।
ना अब दबूँगी
ना दबने दूँगी।

खुद की पहचान से यूं
वक़्त ही बदल दुंगी
क्यों बदलूँ मैं खुद को
बस इन सवालों के जवाबों में
खुद की पहचान बनाऊँगी।
हर्षिता की भूमिका को
यूं ही नहीं शेरनी बनाऊँगी।   

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